शिक्षा दान सबसे बड़ा श्रेष्ठ दान है

शिक्षक का वास्तविक कद उसके पद से नहीं, बल्कि उसके समर्पण से तय होता है

— डॉ. उमेश कुमार दुबे

हम अक्सर सुनते और कहते हैं कि “शिक्षा दान सबसे बड़ा श्रेष्ठ दान है।” यह केवल एक प्रेरक वाक्य नहीं, बल्कि प्रत्येक शिक्षक के जीवन का मूल मंत्र होना चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं, बल्कि प्रत्येक बच्चे के भीतर ज्ञान, संस्कार और आत्मविश्वास का दीप प्रज्वलित करना है।

हमारे शिक्षा तंत्र में विद्यालयों को प्राथमिक, उच्च प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तरों में विभाजित किया गया है। नई शिक्षा नीति-2020 ने भी शिक्षा को विभिन्न चरणों में व्यवस्थित किया है। व्यवस्थाएँ भले ही अलग-अलग हों, लेकिन उनका अंतिम उद्देश्य एक ही है—देश के प्रत्येक बच्चे तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुँचाना।

एक महत्वपूर्ण प्रश्न हमारे सामने खड़ा होता है। यदि किसी प्राथमिक शिक्षक से उच्च प्राथमिक कक्षाओं को पढ़ाने का आग्रह किया जाए, तो वह प्रायः यह कहता है कि “मैं प्रयास करूँगा, भले ही उस स्तर का अनुभव कम हो।” लेकिन कई बार जब उच्च प्राथमिक, माध्यमिक या उच्च माध्यमिक स्तर के शिक्षक से प्राथमिक कक्षाओं को पढ़ाने का अनुरोध किया जाता है, तो उत्तर मिलता है—”मैं उस स्तर का शिक्षक नहीं हूँ।”

यहीं से आत्ममंथन की आवश्यकता शुरू होती है। हमारी वास्तविक पहचान क्या है—हमारा पद या हमारा शिक्षक होना?

सच्चाई यही है कि हम सबसे पहले शिक्षक हैं। हमारे पद, वेतनमान और कार्यस्थल भिन्न हो सकते हैं, लेकिन हमारा मूल दायित्व एक ही है—बच्चों को शिक्षा प्रदान करना।

प्राथमिक कक्षाओं के विद्यार्थियों को पढ़ाना कोई साधारण कार्य नहीं है। यही वह अवस्था है जहाँ बच्चों के व्यक्तित्व, ज्ञान और भविष्य की नींव रखी जाती है। यदि नींव मजबूत होगी, तभी आगे की पूरी शिक्षा सुदृढ़ होगी। कमजोर नींव पर खड़ी कोई भी इमारत अधिक समय तक स्थिर नहीं रह सकती।

यदि कोई व्याख्याता, शिक्षक या प्रधान पाठक अपने पद के अहंकार से ऊपर उठकर प्राथमिक विद्यालय के बच्चों के बीच बैठता है, उन्हें पढ़ाता है और उनके साथ सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में सहभागी बनता है, तो उसका सम्मान कम नहीं होता, बल्कि कई गुना बढ़ जाता है। वह केवल पाठ नहीं पढ़ाता, बल्कि अपने आचरण से यह संदेश देता है कि शिक्षक का वास्तविक कद उसके पद से नहीं, बल्कि उसके समर्पण, संवेदनशीलता और कर्तव्यनिष्ठा से निर्धारित होता है।

एक सच्चा शिक्षक वही है जो परिस्थितियों के अनुसार अपनी जिम्मेदारियों से पीछे न हटे। जहाँ बच्चे हों, वहाँ शिक्षा होनी चाहिए और जहाँ शिक्षा की आवश्यकता हो, वहाँ शिक्षक की उपस्थिति अनिवार्य होनी चाहिए।

आइए, हम अपने पद से पहले अपने शिक्षक होने के दायित्व को पहचानें। जब भी किसी भी स्तर के विद्यार्थियों को पढ़ाने का अवसर मिले, उसे पूरे मन, पूर्ण निष्ठा और सम्मान के साथ स्वीकार करें। यही शिक्षक धर्म है और यही राष्ट्र निर्माण की सबसे मजबूत आधारशिला भी।

निस्संदेह, शिक्षा दान सबसे बड़ा श्रेष्ठ दान है और एक सच्चे शिक्षक की सबसे बड़ी पहचान उसका पद नहीं, बल्कि उसका समर्पण होता है।