
पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने इस स्तंभ की भूमिका और जिम्मेदारियों पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। समाचारों के माध्यम से किसी पत्रकार की पहचान, निष्ठा या पेशेवरता पर सवाल उठाना क्या वास्तव में पत्रकारिता का उद्देश्य है, या फिर यह व्यक्तिगत टिप्पणी और पूर्वाग्रह का रूप लेता जा रहा है—यह सवाल अब सार्वजनिक विमर्श का विषय बन चुका है।
हाल के दिनों में प्रकाशित कुछ समाचारों में बिना आधिकारिक पुष्टि, बिना पक्ष जाने और बिना तथ्यों की ठोस जांच के, एक महिला पत्रकार की छवि पर सवाल उठाए गए। बताया जा रहा है कि संबंधित पत्रकार के पास विधिवत पत्रकारिता शिक्षा और लंबे समय का पेशेवर अनुभव है। इसके बावजूद, एकतरफा टिप्पणी करना न केवल असंवेदनशील है, बल्कि पत्रकारिता की आचार संहिता और नैतिक मूल्यों के भी विपरीत माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी को “फर्जी पत्रकार” जैसे शब्दों से संबोधित करना पत्रकारिता की भाषा नहीं हो सकती। आलोचना और सवाल उठाना मीडिया का दायित्व है, लेकिन वह सत्ता, व्यवस्था और जनहित से जुड़े विषयों पर होना चाहिए, न कि किसी व्यक्ति की गरिमा, पहचान और आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने के लिए।
यह भी स्वीकार्य तथ्य है कि वर्तमान समय में पत्रकारिता के क्षेत्र में अव्यवस्था और अनियमितता देखने को मिलती है, लेकिन इसका समाधान व्यक्तिगत हमलों में नहीं, बल्कि स्पष्ट मानकों, पारदर्शिता और आत्मनियमन में निहित है। जब खबरें तथ्यों के बजाय निजी दुर्भावना पर आधारित होती हैं, तो वे पत्रकारिता नहीं, बल्कि चरित्र हनन का रूप ले लेती हैं।
मीडिया विश्लेषकों का कहना है कि यदि पत्रकार ही पत्रकारों को कठघरे में खड़ा करने लगेंगे, तो जनता का विश्वास डगमगाना स्वाभाविक है। ऐसे में आज आवश्यकता इस बात की है कि पत्रकारिता आत्ममंथन करे और अपने मूल उद्देश्य—सत्य, निष्पक्षता, जिम्मेदारी और जनहित—की ओर लौटे।
यह मामला किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पत्रकारिता की साख, विश्वसनीयता और भविष्य से जुड़ा प्रश्न है, जिस पर गंभीर और जिम्मेदार विमर्श आवश्यक है।
