सफेद चावल या रासायनिक धोखा? राइस मिलों में केमिकल पॉलिश की आशंका

राजनांदगांव।शहर में बिक रहे चावल की असामान्य सफेदी अब गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। आम उपभोक्ताओं के बीच यह चर्चा तेज है कि बाजार में उपलब्ध चावल प्राकृतिक प्रक्रिया से सफेद है या फिर राइस मिलों में अत्यधिक पॉलिश और संभावित रासायनिक (केमिकल) प्रक्रियाओं के जरिए उसे जरूरत से ज्यादा चमकदार बनाया जा रहा है। खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2006 के तहत चावल में कनकी (टूटे चावल) और पॉलिश की स्पष्ट मानक सीमाएँ तय हैं, इसके बावजूद शहर की राइस मिलों में इन मानकों के उल्लंघन की गंभीर आशंका जताई जा रही है।
खाद्य विशेषज्ञों के अनुसार प्राकृतिक चावल का रंग हल्का ऑफ-व्हाइट होता है, जबकि अत्यधिक चमकदार और दूधिया सफेद चावल इस बात का संकेत हो सकता है कि उसे ओवर-पॉलिश किया गया है। इस प्रक्रिया में चावल के आवश्यक पोषक तत्व—विशेषकर विटामिन-B, फाइबर और खनिज—लगभग नष्ट हो जाते हैं और उपभोक्ताओं को पोषण के नाम पर केवल स्टार्चयुक्त चावल मिलता है। लंबे समय तक ऐसा चावल खाने से डायबिटीज़, कुपोषण और पाचन संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
सूत्रों का कहना है कि यदि Food Safety and Standards Authority of India (FSSAI) के अंतर्गत खाद्य सुरक्षा विभाग द्वारा शहर की राइस मिलों में अचानक छापेमारी की जाए, तो चावल को अधिक सफेद और आकर्षक दिखाने के लिए अपनाई जा रही प्रक्रियाओं, तय सीमा से अधिक कनकी मिलाने और संभावित केमिकल उपयोग से जुड़े तथ्य सामने आ सकते हैं। यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि यही चावल खुले बाजार के साथ-साथ सार्वजनिक वितरण प्रणाली और अन्य संस्थागत आपूर्ति तक पहुंचने की आशंका रखता है।
खाद्य सुरक्षा अधिनियम की धारा 26 खाद्य व्यवसायी को सुरक्षित और मानक खाद्य उपलब्ध कराने का दायित्व सौंपती है, जबकि नियमों के उल्लंघन पर मिसब्रांडिंग और मिलावट के तहत सख्त कार्रवाई का प्रावधान है। इसके बावजूद निगरानी तंत्र की निष्क्रियता कई सवाल खड़े कर रही है—जब मानक स्पष्ट हैं, तो नियमित निरीक्षण और सैंपल जांच क्यों नहीं हो रही?
इस पूरे मामले पर प्रेस रिपोर्टर क्लब, प्रदेश अध्यक्ष संजय सोनी ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि जनता की सेहत के साथ किसी भी प्रकार का खिलवाड़ स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने मांग की है कि राइस मिलों में तत्काल सघन जांच अभियान चलाया जाए, प्रोसेसिंग यूनिट्स और भंडारण स्थलों से नमूने सील कर प्रयोगशाला परीक्षण कराया जाए और जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। यदि केमिकल पॉलिश या मानक उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत कठोर दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।
अब सवाल यह है कि क्या सफेदी के नाम पर जनता को रासायनिक धोखा दिया जा रहा है, या फिर शासन-प्रशासन समय रहते सच्चाई सामने लाकर जनस्वास्थ्य की रक्षा करेगा? आने वाले दिनों में इस मामले पर प्रशासन की कार्रवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं।