
रायपुर।छत्तीसगढ़ शासन की विज्ञापन नीति और उसके अमल को लेकर प्रदेश की पत्रकारिता में तेज़ उबाल आ गया है। प्रेस रिपोर्टर क्लब के प्रदेश अध्यक्ष संजय सोनी ने छत्तीसगढ़ शासन से आक्रामक और स्पष्ट शब्दों में सवाल करते हुए मांग की है कि छोटे और मझोले पत्रकारों को भी सरकारी विज्ञापन दिया जाए।
प्रदेश अध्यक्ष संजय सोनी ने कहा कि हाल ही में सामने आए आंकड़ों से यह स्पष्ट हो चुका है कि शासन के पास विज्ञापन के लिए करोड़ों रुपये का बजट उपलब्ध है। जब एक ही एजेंसी को साल भर में दर्जनों करोड़ रुपये दिए जा सकते हैं, तो फिर ज़मीनी स्तर पर काम कर रहे छोटे-मझोले पत्रकारों को यह कहकर क्यों टाला जा रहा है कि “बजट नहीं है” या “नीति आड़े आ रही है”?
उन्होंने कहा कि छोटे और मझोले पत्रकार ही ग्रामीण अंचलों, कस्बों और शहरों की गलियों से शासन तक जनता की आवाज़ पहुंचाते हैं। सीमित संसाधनों, आर्थिक दबाव और जोखिमों के बावजूद ये पत्रकार लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बनकर काम कर रहे हैं। इसके बावजूद उन्हें विज्ञापन नीति से बाहर रखना भेदभावपूर्ण और अन्यायपूर्ण है।
संजय सोनी ने यह भी कहा कि आज के दौर में डिजिटल मीडिया, यूट्यूब चैनल और स्वतंत्र पत्रकार सूचना के सबसे प्रभावी माध्यम बन चुके हैं, लेकिन शासन की विज्ञापन नीति अभी भी पुराने और चुनिंदा ढांचे में उलझी हुई है। यह स्थिति न केवल पत्रकारों का मनोबल तोड़ रही है, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता को कमजोर करने का काम कर रही है।
प्रदेश अध्यक्ष ने शासन से मांग की कि—विज्ञापन नीति में तत्काल सुधार किया जाए,
छोटे, मझोले, डिजिटल और स्वतंत्र पत्रकारों को स्पष्ट रूप से शामिल किया जाए और विज्ञापन वितरण की प्रक्रिया को पारदर्शी व न्यायसंगत बनाया जाए।
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि शासन ने जल्द ही इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए, तो प्रेस रिपोर्टर क्लब इसे सिर्फ बयान तक सीमित नहीं रखेगा, बल्कि पत्रकारों के हक़ के लिए प्रदेशव्यापी आंदोलन छेड़ा जाएगा।
यह मुद्दा अब केवल विज्ञापन का नहीं रहा—
यह छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता के सम्मान, अस्तित्व और भविष्य का सवाल बन चुका है।
