“मार्च आते ही ‘यात्रा भत्ता’ का खेल तेज! फाइलों में दौड़ती गाड़ियां, खजाने पर पड़ रहा बोझ!”

जैसे ही वित्तीय वर्ष का आखिरी महीना मार्च आता है, वैसे ही शासकीय विभागों में “यात्रा भत्ता” के नाम पर खर्चों की रफ्तार अचानक तेज हो जाती है। सवाल यह उठता है कि क्या वास्तव में इतनी यात्राएं हो रही हैं, या फिर कागजों में ही गाड़ियां दौड़ाई जा रही हैं। सूत्रों के अनुसार, यात्रा भत्ता की राशि में अचानक बढ़ोतरी के पीछे बाबू और अधिकारियों की मिलीभगत की आशंका जताई जा रही है। बाबू, जो पूरे सिस्टम की बारीकियों को भली-भांति समझता है, वही इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। फाइलों में यात्रा के नाम पर एंट्री, दूरी का निर्धारण और बिलों के आधार पर भुगतान की प्रक्रिया तेजी से पूरी की जाती है। कई मामलों में यह भी सामने आया है कि जिस दूरी के लिए भत्ता लिया जाता है, वह वास्तविकता से मेल नहीं खाता। कागजों में किलोमीटर अधिक दर्शाए जाते हैं और यात्रा के आधार पर भुगतान लिया जाता है, जबकि वास्तविक स्थिति अलग हो सकती है। “क्लेमिंग” की इस प्रक्रिया में बाबू की सहमति के बिना फाइलों का आगे बढ़ना कठिन माना जाता है, वहीं अधिकारियों की भूमिका भी इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण होती है, जिससे यह पूरी प्रणाली एक संगठित व्यवस्था के रूप में कार्य करती दिखाई देती है। अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि इन खर्चों की निगरानी कौन करेगा? क्या ऑडिट और प्रशासनिक जांच प्रभावी रूप से की जा रही है, या यह केवल औपचारिकता बनकर रह गई है? यदि समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो “यात्रा भत्ता” के नाम पर अनियमितताओं की संभावना बनी रह सकती है, जिससे शासन के संसाधनों पर अतिरिक्त भार पड़ सकता है।

🗣️ प्रेस रिपोर्टर क्लब, प्रदेश अध्यक्ष संजय सोनी का कहना है—
“शासन के धन का उपयोग पारदर्शी और नियमों के अनुरूप होना चाहिए, ताकि किसी भी प्रकार की अनियमितता को रोका जा सके।”