लाल टोपी राजू सोनी, प्रेस रिपोर्टर क्लब छत्तीसगढ़ संयोजक
छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा किसी योजना, विकास या बजट की नहीं, बल्कि संभावनाओं की है — और इन संभावनाओं के केंद्र में हैं पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा। जेल से रिहाई के बाद उनके बयानों ने सियासी गलियारों में ऐसी हवा भरी है कि “भाजपा प्रवेश” की अटकलें चाय की हर गुमटी से लेकर राजधानी के हर दफ्तर तक तैरने लगी हैं।
सुप्रीम कोर्ट से सशर्त जमानत मिलने के बाद लखमा ने खुद को बस्तर की आवाज बताते हुए न्यायपालिका, पार्टी नेतृत्व और यहां तक कि राजनीतिक विरोधियों के बयानों के लिए भी धन्यवाद दिया। राजनीति के जानकार इसे शिष्टाचार कह रहे हैं, जबकि व्यंग्यकार इसे आने वाले मौसम का ट्रेलर मान रहे हैं।
इधर सोशल मीडिया ने तो मानो फैसला सुना दिया है। वहां भाजपा को लेकर नया तंज चल पड़ा है — “पाप धोने की मशीन”। व्यंग्य यह कि जो भी नेता इस मशीन के करीब दिखता है, उसके पुराने दाग-धब्बों पर जनता की नजर और तेज हो जाती है। समर्थक इसे नई शुरुआत बताते हैं, विरोधी इसे सुविधाजनक स्नान।
कांग्रेस खेमे में बेचैनी साफ झलक रही है। आधिकारिक तौर पर सब कुछ सामान्य बताया जा रहा है, लेकिन अंदरखाने चर्चाओं का बाजार गर्म है। वहीं भाजपा की ओर से रहस्यमयी मुस्कान के अलावा ज्यादा कुछ सुनाई नहीं दे रहा — और राजनीति में अक्सर खामोशी ही सबसे ऊंची आवाज होती है।
आम जनता इस पूरे घटनाक्रम को किसी सियासी धारावाहिक की तरह देख रही है। उसे समझ नहीं आ रहा कि यह रणनीति है, संयोग है या फिर भारतीय राजनीति का नया ट्रेंड — जहां विचारधारा से ज्यादा महत्व “एडजस्टमेंट” का है।
कवासी लखमा का वास्तविक कदम क्या होगा, यह तो समय ही बताएगा। फिलहाल छत्तीसगढ़ की राजनीति में अटकलों की धुलाई जारी है, और जनता घनचक्कर की तरह उसी जगह खड़ी है — इंतजार में कि अगला मोड़ किस दिशा में
