मानवाधिकार और पर्यावरण: प्रकृति की रक्षा, मानवता की जिम्मेदारी- डॉ रमेश कश्यप

डॉ रमेश कश्यप राष्ट्रीय अध्यक्ष मानवाधिकार सहायता संस्थान भारत एवं मानवाधिकार एवं सामाजिक न्याय आयोग भारत के उपाध्यक्ष के द्वारा मानवाधिकार और पर्यावरण के बारे में उन्होंने बताया है कि मानवाधिकार केवल व्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और गरिमा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि स्वच्छ, सुरक्षित और संतुलित पर्यावरण का अधिकार भी मानवाधिकारों का अभिन्न अंग है। यदि हवा विषैली हो, पानी दूषित हो और धरती बंजर बन जाए, तो जीवन के अन्य सभी अधिकार स्वतः ही अर्थहीन हो जाते हैं। इसलिए पर्यावरण संरक्षण आज केवल नीति या विकास का विषय नहीं, बल्कि एक मौलिक मानवाधिकार और सामूहिक दायित्व बन चुका है।

संयुक्त राष्ट्र ने भी यह स्वीकार किया है कि स्वच्छ, स्वस्थ और टिकाऊ पर्यावरण प्रत्येक मानव का मूल अधिकार है। स्वच्छ वायु में सांस लेना, सुरक्षित पेयजल प्राप्त करना, प्रदूषण-मुक्त जीवन और प्राकृतिक संसाधनों तक न्यायसंगत पहुंच—ये सभी मानव गरिमा से जुड़े अधिकार हैं। पर्यावरण का क्षरण सीधे-सीधे मानव स्वास्थ्य, आजीविका और जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करता है।

भारतीय संविधान भी इस दायित्व को स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है। अनुच्छेद 21 जीवन के अधिकार के अंतर्गत स्वच्छ पर्यावरण को शामिल करता है, जबकि अनुच्छेद 48(क) राज्य को पर्यावरण संरक्षण का दायित्व सौंपता है। साथ ही अनुच्छेद 51(क)(छ) के माध्यम से प्रत्येक नागरिक को प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और संवर्धन का कर्तव्य सौंपा गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि पर्यावरण की रक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का नैतिक और संवैधानिक दायित्व है।

पर्यावरण प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई और जैव विविधता का ह्रास मानवाधिकारों के लिए गंभीर चुनौती बन चुके हैं। प्रदूषित वातावरण में सबसे अधिक प्रभावित गरीब, आदिवासी, महिलाएं और बच्चे होते हैं, जिनके पास विकल्प सीमित होते हैं। ऐसे में पर्यावरणीय न्याय की अवधारणा मानवाधिकारों से सीधे जुड़ जाती है।

मानवाधिकार के दृष्टिकोण से पर्यावरण संरक्षण का अर्थ है—विकास और प्रकृति के बीच संतुलन। औद्योगीकरण और शहरीकरण आवश्यक हैं, लेकिन यदि वे मानव स्वास्थ्य और भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों को नुकसान पहुंचाते हैं, तो ऐसे विकास की पुनः समीक्षा आवश्यक है। टिकाऊ विकास ही वह मार्ग है जो वर्तमान और भविष्य दोनों की आवश्यकताओं की रक्षा कर सकता है।

आज आवश्यकता है कि पर्यावरण संरक्षण को केवल कानून या अभियान तक सीमित न रखकर जन-आंदोलन का स्वरूप दिया जाए। वृक्षारोपण, जल संरक्षण, प्लास्टिक का बहिष्कार, स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग और प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण दोहन—ये सभी छोटे कदम मिलकर बड़े परिवर्तन का आधार बन सकते हैं।

अंततः यह समझना होगा कि प्रकृति का संरक्षण मानव अस्तित्व की रक्षा है। जब हम पर्यावरण की रक्षा करते हैं, तब हम आने वाली पीढ़ियों के मानवाधिकारों की रक्षा करते हैं। मानवाधिकार और पर्यावरण एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी निभाना ही सच्चे अर्थों में मानवाधिकारों का सम्मान है।