तांदुला नदी पर मंडराता संकट: स्वर्णिम अतीत से संघर्षरत वर्तमान

बालोद। छत्तीसगढ़ के बालोद जिले की जीवनरेखा मानी जाने वाली तांदुला नदी आज अपने अस्तित्व की सबसे बड़ी परीक्षा से गुजर रही है। कभी अपने स्वच्छ, निर्मल और पारदर्शी जल के लिए विख्यात यह नदी क्षेत्र की पहचान हुआ करती थी। इसकी रेत स्वर्ण कणों सी चमकती थी और नदी की गोद में पनपती हरियाली, झाड़ीनुमा वनस्पतियां तथा छिटपुट वृक्ष इसकी प्राकृतिक आभा को और अधिक मनोहारी बना देते थे। तांदुला का जल केवल प्यास बुझाने का साधन नहीं था, बल्कि यह लोकजीवन, संस्कृति और आस्था का केंद्र भी था।
एक समय था जब ग्रामीण और नगरवासी किसी भी घाट पर जाकर अंजुलि भर जल ग्रहण कर लेते थे। नदी का पानी इतना शुद्ध और निर्मल था कि उसे प्राकृतिक वरदान कहा जाता था। इसके तटों पर मिलने वाली दुर्लभ जड़ी-बूटियां और विशेष रूप से “खस” (वेटीवर) का पौधा इसकी विशिष्ट पहचान थे। खस की जड़ों का उपयोग गर्मी के मौसम में घरों के कूलरों में शीतलता और सुगंध के लिए किया जाता है। प्राचीन काल में राजपरिवारों द्वारा भी खस का उपयोग ठंडक और सुगंध के लिए किया जाता रहा है। यह दर्शाता है कि तांदुला नदी केवल जलधारा नहीं, बल्कि प्राकृतिक संपदा का भंडार भी थी।
भारतीय परंपरा में नदियों को मां का स्वरूप माना गया है। रामायण और महाभारत काल से लेकर आज तक नदियों की पूजा-अर्चना जीवनदायिनी के रूप में होती रही है। तांदुला नदी भी इसी सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा रही है। कभी यह वर्षभर प्रवाहित रहती थी और क्षेत्र की कृषि, पेयजल तथा जैव विविधता का प्रमुख आधार थी। नदी का प्रवाह न केवल खेतों को सींचता था, बल्कि आसपास के कुओं और तालाबों को भी जीवन देता था।
अवैध उत्खनन से बिगड़ता संतुलन
पिछले कुछ वर्षों में तांदुला नदी पर अवैध और अंधाधुंध रेत उत्खनन का साया गहराता जा रहा है। भारी मशीनों और ट्रैक्टरों के माध्यम से लगातार हो रही खुदाई ने नदी की प्राकृतिक संरचना को बुरी तरह प्रभावित किया है। परिणामस्वरूप अब यह नदी वर्षा ऋतु के कुछ महीनों तक ही जल से परिपूर्ण दिखाई देती है, जबकि शेष समय इसका अधिकांश हिस्सा सूखा या सूखता हुआ नजर आता है।
स्थानीय नागरिकों के मन में यह सवाल गूंज रहा है कि क्या नदी स्वाभाविक कारणों से सूख रही है या इसे सुनियोजित तरीके से खोखला किया जा रहा है। रेत नदी की प्राकृतिक ढाल और जल धारण क्षमता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जब यही रेत अंधाधुंध निकाल ली जाती है, तो नदी का तल गहरा और असंतुलित हो जाता है, जिससे जल का संचय कम हो जाता है।
निरंतर रेत खनन के कारण आसपास के क्षेत्रों का भूजल स्तर भी तेजी से गिर रहा है। पहले जहां लोग हल्की खुदाई में ही पानी प्राप्त कर लेते थे, अब उन्हें गहरी खुदाई करनी पड़ रही है। इससे किसानों की सिंचाई व्यवस्था प्रभावित हो रही है और पशुपालकों को भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
ग्रामीणों की पीड़ा और चेतावनी
ग्राम नेवारीकला की निवासी लखनीबाई साहू ने बताया कि गांव में नदी का पानी धीरे-धीरे दूषित होता जा रहा है। ग्रामीणों को कई बार मुनादी कर रेत न निकालने की चेतावनी दी गई, लेकिन इसके बावजूद चोरी-छिपे रेत उत्खनन जारी है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में जल स्तर लगातार नीचे जा रहा है और आने वाले समय में जल संकट की आशंका बढ़ती जा रही है।
नदी किनारे संचालित हो रहे अवैध ईंट भट्ठे भी पर्यावरण के लिए खतरा बन गए हैं। इन भट्ठों से निकलने वाला धुआं और अपशिष्ट नदी और आसपास के वातावरण को प्रदूषित कर रहा है। यदि समय रहते इन गतिविधियों पर रोक नहीं लगाई गई, तो क्षेत्र में जल और वायु प्रदूषण की समस्या गंभीर रूप ले सकती है।
पर्यावरण और जैव विविधता पर असर
तांदुला नदी केवल जल का स्रोत नहीं है, बल्कि यह हजारों जीव-जंतुओं, पक्षियों और वनस्पतियों का आश्रय स्थल है। नदी के किनारों पर बसे गांवों की आजीविका भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इसी पर निर्भर करती है। नदी के क्षरण से मछलियों की प्रजातियां प्रभावित हो रही हैं, जलचर जीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहा है और पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित होता जा रहा है।
यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाले वर्षों में तांदुला नदी केवल इतिहास की एक स्मृति बनकर रह जाएगी। यह न केवल पर्यावरणीय संकट होगा, बल्कि सामाजिक और आर्थिक संकट भी उत्पन्न करेगा।
आवश्यक है सामूहिक पहल
आज आवश्यकता है प्रशासनिक सख्ती, प्रभावी निगरानी और जनजागरूकता की। अवैध रेत उत्खनन और प्रदूषण पर तत्काल अंकुश लगाना समय की मांग है। स्थानीय प्रशासन, जनप्रतिनिधि, सामाजिक संगठन और नागरिक यदि मिलकर ठोस कदम उठाएं, तो इस नदी को बचाया जा सकता है।
साथ ही, वृक्षारोपण, जल संरक्षण अभियान और सामुदायिक निगरानी जैसे प्रयास भी जरूरी हैं। केवल सरकारी कार्रवाई ही नहीं, बल्कि जनसहभागिता भी इस संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
बालोद की धड़कन कही जाने वाली तांदुला नदी को बचाना अब केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का प्रश्न बन चुका है। यदि समय रहते चेतना नहीं जागी, तो स्वर्णिम अतीत की यह धरोहर हमेशा के लिए खो सकती है।
तांदुला नदी की पुकार स्पष्ट है—उसे बचाने के लिए आज ही निर्णायक कदम उठाने होंगे, ताकि वह पुनः अपनी स्वच्छता, सुंदरता और जीवनदायिनी पहचान के साथ प्रवाहित हो सके।