
राजनांदगांव जिले के 51 वार्डों में जब भी पार्षद चुनाव आते हैं, तब हर वार्ड में 5 से 7 प्रत्याशी मैदान में उतरते हैं। चुनाव के दौरान सभी प्रत्याशी गली-गली, घर-घर जाकर जनता से मिलते हैं, हाथ जोड़ते हैं, समस्याएँ सुनते हैं और बड़े आत्मविश्वास से कहते हैं—
“आपकी हर समस्या का समाधान हमारे पास है।”
लेकिन चुनाव परिणाम आते ही यह दृश्य पूरी तरह बदल जाता है।
👉 चुनाव से पहले पार्षद जनता के पास होते हैं,
👉 चुनाव के बाद जनता पार्षद के पास।
यह लोकतंत्र है या जनप्रतिनिधियों की सुविधा का तंत्र?
❓ जीतते ही क्यों बदल जाता है व्यवहार?
चुनाव जीतने के बाद वही पार्षद, जो कल तक हर घर की चौखट पर थे, अब अपने दफ्तर, बंगले या कार्यालय तक सीमित हो जाते हैं। अब जनता को खुद समय निकालकर, काम छोड़कर, लाइन में लगकर अपनी समस्याएँ बतानी पड़ती हैं।
सवाल यह है कि—
क्या जीत के बाद पार्षदों की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है?
क्या जनसेवा सिर्फ चुनाव तक सीमित होती है?
क्या जनता केवल वोट डालने की मशीन है?
⚠️ समाधान की जगह टालमटोल-
हकीकत यह है कि जनता जब पार्षदों के पास जाती है, तो बहुत कम मामलों में ठोस समाधान होता है।
कहीं फाइल आगे बढ़ा दी जाती है
कहीं “अभी बजट नहीं है” का बहाना
कहीं “अगली बैठक में देखेंगे” कहकर टाल दिया जाता है
चुनाव के समय जो पार्षद 100% समस्याएँ हल करने का दावा करते हैं, जीत के बाद वही प्रयास नाममात्र रह जाता है।
🔥 जनता पूछ रही है — जवाब कौन देगा?
राजनांदगांव की जनता अब यह सवाल खुलकर पूछ रही है कि—
जब चुनाव के समय पार्षद खुद हमारे पास आ सकते हैं,
तो चुनाव के बाद हमारे मोहल्लों, गलियों, बस्तियों में क्यों नहीं आते?
जनप्रतिनिधि का अर्थ सिर्फ पद और कुर्सी नहीं, बल्कि निरंतर जनता के बीच रहना है।
📢 चेतावनी और संदेश-
यह समाचार केवल आरोप नहीं, बल्कि चेतावनी है।
अगर जनप्रतिनिधियों ने अपना रुख नहीं बदला,
अगर पार्षदों ने फिर से जनता के बीच जाना शुरू नहीं किया,
तो आने वाले चुनाव में जनता भी जवाब देना जानती है।
